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सेल्फी... एक सनक !

यह दौर दरअसल मोबाइल क्रांति का है। इसने सूचनाओं और संवेदनाओं दोनों को कानों-कान कर दिया है। अब इसके चलते हमारे कान, मुंह, उंगलियां और दिल सब निशाने पर हैं। मुश्किलें इतनी बतायी जा रही हैं कि मोबाइल डराने भी लगे हैं। इसी क्रान्ति ने मौजूदा दौर में 'सेल्फी' नाम के लाईलाज बुखार को भी संक्रमण की तरह आम-ओ-ख़ास तक फैलाया है। सेल्फी फीवर से संक्रमित मरीज अब लापरवाहियों के चलते मौत की आगोश में भी समाते जा रहें हैं। अक्सर सेल्फी ज्वर से तपते व्यक्ति की एक तस्वीर यादगार बनकर परिवार के लिए ज़िन्दगी भर का दर्द दे जाती हैं।
सेल्फ़ी हमारे सेल्फ मूड की खुली नुमाईश हैं जिसके जरिये हम अक्सर अपनी संवेदनहीनता का परिचय सरे राह-बीच बाजार दे जाते हैं । ख़ुशी का मौक़ा हो या मातम का रुदन, मज़हब की चौखट हो या बिस्तर की सलवटों में सिमटता जिस्म,  सेल्फ़ी हर मौके की चश्मदीद गवाह है । मोबाईल फ़ोन के फ्रंट कैमरे नें कई बार रिश्तों की मिठास में कड़वाहट का ज़हर भी घोला है लेकिन हम किसी भी घटनाक्रम से सबक नही लेते । मुझे लगता है सेल्फ़ी सिर्फ एक सनक है, हमारे दिमाग की एक ऐसी उपज जिसमें संवेदनाओं का कोई मोल नही । कई बार तो ये भी लगता है कि बिना सेल्फ़ी के ख़ुशी और मातम के मौके अधूरे हैं । रस्म, रिवाज सा हो गया है सेल्फ़ी का ज्वर । अफ़सोस तब होता है जब सेल्फ़ी का संक्रमित मरीज श्यमशान घाट, सड़क हादसे, भीख लेते-देते, किसी की मदद करता एक सेल्फ़ी उतारता है और बेहद गंभीर भाव से सोशल मीडिया पे उसे पोस्ट कर घटनाक्रम से अवगत कराते हुए मौके पर अपनी मौजूदगी का सबूत पेश करता है । उसे इस बात से बाद में सरोकार होता है कि मरने वाले से उसका क्या रिश्ता है, जिसकी मदद करते हुए हाथ आगे बढ़ाये वो कितना जरूरतमंद है ? सिर्फ एक सेल्फ़ी फिर वाहवाही... हमने फ़लाना मोहल्ले में वृक्षारोपण किया, फ़ला तालाब की सफाई की । वृद्ध आश्रम में दर्जन भर केले बांटे, गरीबों को भण्डारा कराया ।  ऐसे कई मौके हैं जो सेल्फ़ी के जरिये आपके सेल्फिश होने की कहानी कहते हैं पर भ्रम में जीते सेल्फीरियों को लगता है सब ठीक है। दरअसल हकीकत वो नही होती जैसा हम सोचते समझते हैं ।  हम बाज़ार में कहीं भी कभी भी मोबाईल कैमरे के जरिये फोटोग्राफी के शौक को पूरा कर रहें हैं। दुर्भाग्य देखिये इस देश में हर हाथ को काम नहीं पर हाथों हाथ मोबाइल फोन है। हर वर्ग-उम्र के पास संचार क्रान्ति की डिबिया मौजूद हैं जिसके आगे लगी एक आँख हमारी सूरत और सीरत को हूबहू नहीं देखती  पर हमको लगता है हर शॉट परफेक्ट है। वैसे भी सेल्फ सर्विस की सूरत अलग से दिखाई पड़ती हैं । किसी की आधी तो किसी की पूरी जीभ बाहर । होंठ चोंच की तरह आगे को खींचे हुए, अधखुली आँखे और बिना कंघी के संवरें बाल । वाह क्या खूबसूरत तस्वीर... अब तो सेल्फ़ी पीड़ितों के लिए बाज़ार में दो हाथ लंबी छड़ी भी उपलब्ध है जिस पर मोबाइल लटकाकर लटके-झटके के साथ खींचे हुए चेहरे की एक क्लिक...।
सेल्फ़ी के दौर में सेल्फिश हुये इंसान ने रिश्तों को महज़ एक तस्वीर में समेटने की कोशिश की है । हम हर मौके पर एक ग्रुप सेल्फ़ी के बाद सेल्फ डिपेंड नज़र आते है । कई मायनों में सेल्फ़ी की भूमिका आजीवन यादगार बनकर रह जाती है तो कई बार एक सेल्फ़ी यादगार तस्वीर के रूप में हम पर हार चढ़वा देती है । अक्सर सेल्फ़ी के पागलपन में हमारे हिस्से तस्वीर की शक्ल में सिर्फ मौत आती है । कई घटनाएँ है जो जहन को झकझोर देती हैं पर सबक कितनो को मिलता है ? खोजिएगा तो आंकड़े शून्य  ।
   मोबाइल फोनों ने किस तरह जिंदगी में जगह बनाई है, वह देखना एक अद्भुत अनुभव है। कैसे कोई चीज जिंदगी की जरूरत बन जाती है- वह मोबाइल के बढ़ते प्रयोगों को देखकर लगता है। वह हमारे होने-जीने में सहायक बन गया है। पुराने लोग बता सकते हैं कि मोबाइल के बिना जिंदगी कैसी रही होगी। आज यही मोबाइल खतरेजान हो गया है। पर क्या मोबाइल के बिना जिंदगी संभव है ? जाहिर है जो इसके इस्तेमाल के आदी हो गए हैं, उनके लिए यह एक बड़ा फैसला होगा। मोबाइल ने एक पूरी पीढ़ी की आदतों उसके जिंदगी के तरीके को प्रभावित किया है।  ये फोन आज जरूरत हैं और फैशन भी। नयी पीढ़ी तो अपना सारा संवाद इसी पर कर रही है, उसके होने- जीने और अपनी कहने-सुनने का यही माध्यम है। इसके अलावा नए मोबाइल फोन अनेक सुविधाओं से लैस हैं। वे एक अलग तरह से काम कर रहे हैं और नई पीढी को आकर्षित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। ऐसे में सूचना और संवाद की यह नयी दुनिया मोबाइल फोन ही रच रहे हैं। आज वे संवाद के सबसे सुलभ,सस्ते और उपयोगी साधन साबित हो चुके हैं। मोबाइल फोन जहां खुद में रेडियो, टीवी और सोशल साइट्स के साथ हैं वहीं वे तमाम गेम्स भी साथ रखते हैं। वे दरअसल आपके एकांत के साथी बन चुके हैं। वे एक ऐसा हमसफर बन रहे हैं जो आपके एकांत को भर रहे हैं चुपचाप। कोशिश कीजिये इस जरूरत का जरूरत भर इस्तेमाल करने की साथ ही उसके सामने की आँख [फ्रंट कैमरा] से आँख मिलाते वक्त सावधानी बरती जाए।  आपकी सावधानी ना जाने कितनी जिंदगी की खुशियों का हिस्सा है .. !   

कुछ सवाल 'स्मिता' से

 "सलाम करता हूँ हुजूर के जज्बे, ईमानदारी और सर झुकाता हूँ उनकी कर्तव्यनिष्ठा पर जिन्होंने बारिश से भीगते जूते तो बचा लिए पर खुद तरबतर होकर यातायात व्यवस्था सँभालते रहे। सोशल मीडिया पर पिछले दिनों ये पोस्ट आई तो लगा मुझे भी कुछ कह लेना चाहिए, पोस्ट में बात ही कुछ ऐसी लिखी है । पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हुई, जिसमें एक कर्तव्यनिष्ठ सिपाही की बारिश में भीगती हुई तस्वीर है । पोस्ट में लगी तस्वीर निःसंदेह उस सिपाही की कार्यदक्षता को प्रमाणित करती है जिसे न बारिश की नमी से खीज उठती है, ना ही उसे लू के थपेड़ों से डर लगता होगा।" ये पोस्ट सोशल मीडिया के पते पर मुझे मिली, पतेदार का नाम स्मिता तांडी  है। नाम काफी मक़बूल है, फिर भी उन लोगों से इस नाम का तार्रुख़ जरूरी है जो स्मिता को नहीं जानते। पेशे से छत्तीसगढ़ पुलिस में सेवारत हैं, मोहतरमा का दूसरा परिचय भी है, जो शायद पुलिस सेवा से ज्यादा बड़ा है। पारिवारिक जिम्मेवारियाँ , पुलिस की नौकरी के साथ-साथ सामाजिक कर्तव्यों का पालन करना मोहतरमा की नियमित दिनचर्या में शामिल हैं। स्मिता का नज़रिया मुझे पुलिसिया कम, मानवीय ज्यादा नज़र आता है। चूँकि मेरी फेसबुक पर मित्र हैं लिहाजा उनकी पोस्ट के जरिये मानव सेवा की तस्वीरें रोज देखता रहता हूँ। एक सामाजिक संस्था की सदस्य हैं जिसका काम जरूरतमंदों को हर संभव मदद करना है। उनकी संस्था [जीवनदीप] ने कई ज़िन्दगी आबाद की, कइयों को बिछड़े माँ-पिता से मिलवाया तो कई घरों में उम्मीद की नई रोशनी पहुँचाई। आप साधुवाद की सिर्फ हकदार नहीं, बल्कि आपकी पूरी टीम बिगड़ते परिवेश में मानवीय मूल्यों को सहेजने की कोशिशों में अब तक सफल हैं।
                           स्मिता जी, मैंने पुलिस और पुलिसिया गतिविधियों को करीब से देखा है। सच कह रहा हूँ कभी अच्छा लिखने का मन ही नहीं हुआ, मैं ये नहीं कहता इस देश का पुलिस परिवार अच्छा नहीं है लेकिन उनकी संख्या उस भीड़ में नहीं के बराबर है जहां खाकी से लिपटा अधिकाँश चेहरा भ्रष्ट, बेईमान है। वो अमानवीय कृत्यों की घिनौनी मंडी में अपनी पारी का इंतज़ार करता खड़ा नज़र आता है। आपने जिस पोस्ट के जरिये पुलिसिया जनभक्ति की एक तस्वीर प्रस्तुत की वो सही मायने में एक ईमानदार इंसान की हो, जिसे अपने कर्तव्यपथ में बारिश की नमी से न खीज उठती है ना ही लू के थपेड़ों से सेहत का मिज़ाज़  बदलता है, पर ऐसे ईमान की रोटी खाने वालों की जरूरत कितनों को है ? अगर हुजूर ज्यादा कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदारी की रोटी खाते है तो मातहतों का हाजमा खराब रहता होगा या फिर हजूर को उनके हुक्मरान चैन की नींद नहीं लेने देंगे। चौराहे पर खड़ा सिपाही नियम-कायदे को जूते की नोक पर रखने वालों को नहीं देख पाता । उसकी नज़र सिर्फ कमजोर और बेबस को तलाशती रहती है, ताकि ड्यूटी का वक्त ख़त्म होने तक वर्दी की जेब भारी हो सके। यही हाल थानों, दफ्तरों में हैं। विडम्बना तो यही है हम बाज़ार में भीड़ से मानवता और नैतिक मूल्यों की उम्मीद रखतें है जबकि उसका अभाव हमारे परिवार [संस्था-विभाग] में अधिक होता है। देश के भिन्न-भिन्न सूबों से पुलिसिया कार्यशैली की ख़बरें सामने आती रहती हैं। उन ख़बरों में प्राथमिकता जरूर पुलिस की गैरवाजिब करतूतें, क्रूरता की होती हैं। क्या कीजियेगा बाज़ार की मांग के मुताबिक़ जबसे अख़बार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मंडी में ख़बरों में तड़का लगने लगा तब से अधिकाँश काले कारोबारियों को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का मालिकाना हक़ मिल गया। हम तो बस उस रसोइये की भूमिका में हैं जिसे हर ग्राहक की ज़बान के मुताबिक़ स्वाद परोसना है। हाँ शुक्र है सोशल मीडिया का जहाँ काफी कुछ लिखने, बोलने की आज़ादी है। 
 लिखते-लिखते हुजूर को भूल गया, चलिए मुद्दे पर आता हूँ। स्मिता जी आपकी पोस्ट जिसे आपने किसी राहुल शर्मा जी के फेसबुक पेज से लिया और काफी कुछ लिखकर उसे जनहित से जुड़ा मसला बताते हुए शेयर करने की अपील की। पोस्ट के जरिये आपका मकसद नकारा-निकम्मे लोगों को प्रेरणा देना और उनमें देशभक्ति-कर्तव्यनिष्ठा की भावना जागृत करना है। सच बताइयेगा, क्या जो सोने का अभिनय कर रहें हैं उन्हें जगाया जा सकता है ? क्या उन लोगों में देशभक्ति-कर्तव्यनिष्ठा की उम्मीद दिखाई पड़ती है जो सिर्फ पैसों के लिए श्रम कर रहें हैं ? क्या वो लोग मानवीय नज़रिये से किसी बात को देखते हैं जिनका ईमान बाज़ार में बैठी किसी तवायफ की दहलीज़ पर नंगा पड़ा है ? क्या उनसे कोई उम्मीद की जा सकती है जो अपने-अपने आकाओं के जूतों की गर्द झाड़कर नौकरी की सलामती का ढोल पीट रहें हैं ? हम किसी ना किसी रूप में बेईमान हैं, जब भी देखता हूँ किसी बेईमान को तो सोचने लगता हूँ आखिर इसका अधिकतम मूल्य क्या होगा ? हालांकि इस तरह की जमात वालों का हुलिया ही उनकी कीमत का अघोषित टैग होता है। आपकी उस पोस्ट में पत्रकारों की मानसिकता और उनकी असंवेदनशीलता का जिक्र भी है। जरूरी भी है, पत्रकार ? इस दौर में पत्रकारिता की तलाश ठीक उसी तरह है जैसे किसी बच्चे के हाथ से मोबाइल छीनकर "चाचा चौधरी" वाला कॉमिक्स पकड़ा देना। सब प्रायोजित है, ठीक करने की मानसिकता से रंगा हुआ है। अब सामजिक सरोकार को कहीं कोई जगह नहीं मिलती, ना ख़बरों में न ही जनसेवा-देशभक्ति की शपथ लेने वालों में। ऐसे में आपकी अपील कितनी सार्थक होगी ? मैं नही बता सकता, पर यक़ीन मानिये यहाँ कोई नहीं सुनता, बस हम शोर मचाते रह जाते हैं। वैसे भी कुनबा जिनका बड़ा होता है वे अपने-अपने स्तर पर मजबूत होते हैं। ऐसे में हरियाणा के सोनीपत का ये जवान जिसका नाम राकेश कुमार है वो बारिश में भीगकर कर्तव्य की मिसाल पेश करे या फिर परिवार की खुशियों को ताक पर रख दें किसी को फर्क नहीं पड़ता। 
  एक बार फिर पुलिसकर्मी राकेश और मोहतरमा स्मिता जी को नमन जिन्होंने मानवीय संवेदनाओं के साथ-साथ कर्तव्यों की राह पर ईमानदारी से चलने की कम से कम कोशिश तो की है। 

ॐ शांति... ॐ शांति.. ॐ शांति

" सियासत की बिसात पर एक लाश रखी गई और उसके पैरोकारी की आड़ में सत्ता पर निशाना साधा गया । लाश को पहचानने वाले आज सैकड़ों की तादात में हैं, मगर कल तक वो अकेला था । जिंदगी की तमाम उलझनों से तंग होकर जब उसने अग्नि स्नान किया तो बचाने वाला भी कोई नहीं था । आज उसके परिवार की पैरवी करने वालों की भीड़ सरकारी नौकरी, रुपया और तमाम सरकारी सुविधाएँ मांग रही है । तमाम उम्र गुज़र जाती मगर उसका नाम पहचान को मोहताज़ रह जाता, भला हो मौत का जिसने नाम को मकबूल किया ।"
सच तो ये है कि जितने भी लोग उसकी मौत पर आज स्यापा कर सरकार को कोस रहें हैं वो खुद उसके लाश होने के पहले की पहचान से वाकिफ़ नहीं है । सोचता हूँ उस दिव्यांग के बारे में जिसे मैं खुद नहीं जानता, सिर्फ ख़बर और ख़बरों के लिए होते तमाशे ने मुझे उससे परिचय करवाया है । मैंने उसे कभी देखा भी नहीं फिर भी सोचता हूँ वो कितना कायर रहा होगा जिसने सत्ता की चौखट पर जिंदगी ख़ाक कर दी । अरे । मौत से रिश्तेदारी निभानी ही थी तो सरकार की चौखट ही क्यों भाई ? कहीं और क्यूँ नही । सरकारें मुफ़लिसी दूर नहीं करती उसे शायद ये ख़बर नहीं थी । तुम तो हमेशा के लिए चैन की नींद पा गए मगर कुछ सियासी सुरमा अचानक जाग गए हैं । सिर्फ तुम्हारी लाश का नाम पता है, उसकी आड़ में ताल ठोंककर सियासी चरित्रवलि लिख रहें हैं । कोई सड़क पर लोट रहा है तो कोई बोल बच्चन की आड़ में अपने अपने आकाओं की पैरवी करता दिखाई पड़ रहा है । सियासत की चरित्रहीनता को सबने नंगा देखा है, बात कहने-सुनने की नहीं बस मौक़ा मिलने की है । शायद उनको इससे अच्छा मौका ना मिले । 
राजनीति के खेल में कौन किसको कब किस दांव में पछाड़ दे मालूम नहीं होता । कुछ इसी तरह की धोबी पछाड़ में सूबे के सियासी सुरमा सुर ताल के साथ दाँव देने की जुगत में जनसरोकार के मसलों से दूर होते जा रहें हैं । पिछले दिनों राजधानी रायपुर के सीमावर्ती क्षेत्र बिरगांव में रहने वाले दिव्यांग योगेश साहू ने मुख्यमंत्री निवास के सामने आत्मदाह की कोशिश की । करीब 85 फीसदी जल चुके योगेश को आनन्-फानन में इलाज के लिये अस्पताल भेजा गया जहां तमाम कोशिशों के बावजूद जिंदगी रूठ गई । दरअसल योगेश मुख्यमंत्री निवास में चल रहे जनदर्शन में पहुंचकर अपनी समस्या और मांगों का पुलिंदा डाक्टर रमन सिंह को सौपना चाहता था, वक्त की हेराफेरी में उस दिन उसकी मुलाक़ात मुख्यमंत्री से नहीं हो पाई । लिहाज उसने पेट्रोल छिड़ककर खुद को आग के हवाले कर दिया । योगेश इससे पहले भी चार बार समस्याओं की गठरी बांधे मुख्यमंत्री निवास पहुँच चुका था । समस्या का बोझ शायद पहले की 4 मुलाकातों में कम नहीं हुआ होगा तभी इस बार इतना बड़ा फैसला लिया गया, मगर ये कोई रास्ता नहीं है । समस्या किसे नहीं है ? मैं ये मानता हूँ योगेश ने सिर्फ ना अपनी कायरता का परिचय दिया बल्कि उस जिम्मेवारी से भी मुँह मोड गया जो परिवार के प्रति थी । आर्थिक रूप से कमजोर दिव्यांग योगेश की मुफ़लिसी को मैंने करीब से नहीं देखा है मगर शोर है की परिवार काफी तंगहाल है । तंगहाली का मतलब ये तो नहीं कि हम ख़ुदकुशी कर लें और उन लोगों के जिंदा हो जाने का जरिया बन जाएँ जो कल तक हमारे जैसे लाखों दिव्यांगों को अपनी चौखट पर पैर तक नहीं रखने देते । सरकार के भरोसे बच्चे पैदा करना, उन्हें पढ़ाना, उनकी शादी से लेकर फिर बच्चे पैदा करने की उम्मीद हमें शायद ख़ुदकुशी को मजबूर कर रही है । 
आज हर गरीब को रोटी कपड़ा और मकान की जरूरत है । परिवार के भरण-पोषण से लेकर ईलाज तक का ठेका सरकारों ले । हम सिर्फ खाएंगे, बच्चे पैदा करके देश की जीडीपी ग्रोथ बढ़ाने में बराबर की हिस्सेदारी निभाएंगे । सरकारें मुफ्तखोरी की आदत डाल चुकीं है, वजह सत्ता की कुर्सी । जिनके पास कुर्सी नहीं वो ऐसे दिव्यांग योगेश साहू के आत्मघाती कदम पर रोटी सेकने को बेताब हैं । छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के प्रमुख अजीत जोगी ने योगेश के आत्मघाती कदम के लिए सत्ता पक्ष को जिम्मेदार ठहराया है । उन्होंने कल ही छत्तीसगढ़ बंद का आह्वान किया जिसे आंशिक सफलता भी नहीं मिल पाई । अजीत जोगी ने सरकार से दिव्यांग के परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी, 50 लाख की सरकारी मदद के अलावा बहुत कुछ माँगा है । अच्छा है, इन्ही लोगों की नजर में जिसकी जिन्दा होते ना कोई पहचान थी, ना कोई बखत वो मौत के बाद सियासी अखाड़े में काफी कीमती और सामाजिक दिखाई पड़ने लगा । 
सवाल सिर्फ सियासत का है । 
1. आखिर कितने लोग उस दिव्यांग योगेश को सीधे तौर पर जानते हैं ? 
2. जिस भीड़ ने योगेश की मौत का मातम मनाया उसमें से कितने लोगों ने उसे जिंदगी की परेशानियों से लड़ना सिखाया ? 
3. कितने रुदाली हैं जिन्होंने योगेश की बेबसी, लाचारी पर मदद को हाथ आगे बढ़ाये ?
4. कौन-कौन लोग हैं जिन्होंने उसकी मौत के बाद उसके पतिवार की परेशानियों को कम करने का बीड़ा अपने कंधे पर लिया ? 
कई सवाल हैं साहब लिखने को पर लिखकर मुझे अच्छा नहीं लगेगा, आप पढ़ेंगे तो नाहक लाल-पीले होंगे । मुझे तो आपके तेवर की वो शक्लों सूरत भी आज तक याद है जोगी जी जब आप इस प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बनने के बाद केबिनेट की पहली बैठक लेने अम्बिकापुर पहुंचे थे । आपकी और मेरी तल्ख़ बातों की कुछ यादें हैं जहन में लेकिन यहां जिक्र करके दिव्यांग की मौत पर होते स्यापा में खलल नहीं डालूँगा । मरने वाले की आत्मा को ईश्वर शांति दे मगर उसकी मौत पर सियासत की जुबान से निकलते आरोप-प्रत्यारोप शायद ही उसे चैन की नींद सोने दे । कल ही का पूरा ड्रामा देखे तो छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के बंद में सिर्फ शक्ति प्रदशर्न की कोशिश रही, मौत के बहाने सरकार को ताकत दिखाने की कोशिश की गई । बंद असफल रहा, कोशिशें नाकाम दिखी । सरकार के प्रधान भी बोलने से बाज नहीं आये उन्होंने कह दिया जोगी का भ्रम इस बार टूट ही गया । उनके साथ कोई भी नहीं, सिर्फ हंगामा मचाने से सत्ता की पेशानी पर बल नहीं पड़ने वाला । वाह .... जिसके लिए तमाशे का आयोजन था उसके विषय को दरकिनार कर सियासतदार अपनी अपनी ताकत का आंकलन करते दिखे । 
मुझे लगता है, हम सब कुछ सिर्फ स्वार्थ के लिए करते हैं । सामाजिक सरोकार भी सिर्फ स्वार्थ के लिए । जनहित के मुद्दे भी अपनी रोटी सेकने की जुगत में । सोचता हूँ हम कितने चेहरे लिए बाज़ार में आम जनमानस की भीड़ में शामिल रहते हैं ? कभी मोमबत्तियाँ जलाते हैं तो कभी चेहरे की ताजगी पे चिंता के भाव दिखाकर लोगों की भावनाओं से खेलते हैं । वो सोचते हैं भीड़ उनके साथ है, मगर भीड़ की शक्ल में सबकी अपनी अपनी भावनायें निहित होती है जो ना दिन के उजाले में नज़र आती हैं ना जलाई गई मोमबत्तियों की रोशनाई में ।
अंत में सिर्फ इतना ही .... भगवन उस दिव्यांग की आत्मा को शांति देना जो इन दिनों राजनीति के चूल्हे पर कुछ लोगों की उम्मीद का पुलाव बना हुआ है । 
                                       ॐ शांति.. ॐ शांति... ॐ शांति.. ॐ शांति !

इंतज़ार.. तब तक सिर्फ मलाल !

                                           
                                                    "उसे मालूम है कि शब्दों के पीछे
                                                      कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं
                                                     और हत्या अब लोगों की रुचि नहीं –
                                                     आदत बन चुकी है
                                                     वह किसी गँवार आदमी की ऊब से
                                                     पैदा हुई थी और
                                                     एक पढ़े-लिखे आदमी के साथ
                                                     शहर में चली गयी"
                    गौरांग मर्डर मिस्ट्री पुलिस ने सुलझा ली है। पुलिस की कहानी पर गौरांग के परिजन और शहर के कुछ जागते लोगों को यक़ीन नहीं है । गौरांग के परिजन और शहर के जिन जागरूक लोगों का जिक्र कर रहा हूँ वो इस मामले में न्याय चाहते हैं हालांकि पुलिस की कहानी के मुताबिक़ गौरांग की मौत गैर इरादतन ह्त्या  है । पुलिस ने गैर इरादतन के कारणों का खुलासा नहीं किया है । चार रईसजादे मामले में आरोपी बनाकर ख़ास इंतज़ामात के बीच कल जेल भेज दिए गए । इस सनसनीखेज मामले का पटाक्षेप करते वक्त जिले के पुलिस कप्तान ने बिलासगुड़ी में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई जहां पत्रकारों के अलावा सैकड़ों की संख्या में जिज्ञासु तमाशबीन मौजूद रहे । पुलिस की कहानी ज़िंदा होने का सबूत दे रहे लोगों के गले नहीं उतर रही और मैं पुलिस की लीपापोती को सालों से देखता चला आ रहा हूँ । सच अब भी गौरांग की मौत के साथ दफ़न है । कोशिश करना है इस मौत का सच और वजह दोनों सामने आये साथ ही क़ानून के कुछ पैरोकारों की घिनौनी सूरत । ताकि लोग भी देखें रसूखीयत की चौखट पर कानून के विवेचक कितने बौने और बेईमान हैं ।
                                                   मैं इस बात से खुश हूँ कि जिस शहर का वाशिंदा हूँ वहां अब भी कुछ लोग ज़िंदा हैं । कभी-कभी भ्रम होता था मुर्दों के शहर में मैं रोज सुबह घर से निकलकर कमाने-खाने बाहर शहर को चला जाता हूँ, रात होते ही फिर अपने घरौंदें में । क्या हूँ, किसके साथ हूँ और किस काम को करता हूँ ? इससे ज्यादा की ख़बर नहीं थी मुझे । स्मार्ट होते शहर बिलासपुर में पिछले गुरूवार (20/21 जुलाई की दरम्यानी रात) को अय्याशी के एक अड्डे (रामा मेग्नैटो मॉल के टीडीएस बार) में गौरांग बोबड़े नाम के एक युवक की खून से सनी लाश संदिग्ध परिस्थितियों में पाई गई । मामला मॉल की दहलीज से निकलकर पुलिस की चौखट पर पहुँचा । मौक़ा मुआयना और मरने वाले की ख़बर घर तक पहुंचाकर पुलिस ने विवेचना की शुरुआत की । इस बीच ख़बर संस्कारधानी से निकलकर राजधानी रायपुर होते हुए देश की राजधानी दिल्ली तक पहुँच गई । मीडिया के शोर शराबे और पीड़ित परिवार के रुदन पर कुछ लोग सामने आये । चूँकि मामला बड़े घर के बिगड़े नवाबों से जुड़ा था लिहाजा हल्ला मचना स्वाभाविक हो गया । दरअसल मृतक गौरांग बोबड़े का एक मित्र केलिफोर्निया में रहता है जो पिछले दिनों बिलासपुर आया था । मित्र के विदेश से आने की ख़ुशी में कुछ देशी मित्रों ने पार्टी का इंतज़ाम किया। पार्टी शहर के मशहूर टीडीएस बार में रखी गई जहां शराब,शबाब और कबाब का भरपूर इंतज़ाम था । थिरकती बार बालाओं की अदाओं के बीच जाम पे जाम छलकते गए । नशे की खुमारी सर चढ़ती गई और वक्त पहर पे पहर बदलता गया । रात को शुरू हुई महफ़िल का दौर तड़के ढाई बजे तक चलता रहा, इस बीच आखिर क्या हुआ ? क्यों हुआ ? किसने किया ? कई सवाल... सुबह सिर्फ ख़बर मातम की बाहर आई । विदेशी मेहमान और गौरांग के दोस्त की खातिरदारी में टीडीएस बार सुबह ढाई बजे तक खुला रहा, बाउंसर और सुरक्षाकर्मी ड्यूटी पर मौजूद रहे । हालांकि ये पहला मौक़ा नहीं था जब भोर तलक टीडीएस बार की रौशनाई में जामें दौर छलकता रहा । ये वो अड्डा है जहां रात के अँधेरे में शहर के कुछ सफेदपोश और उनकी संताने पैसों की गर्मी में तपते तपते इस कदर नंगी होती हैं कि देखने वाले को यक़ीन भी नहीं होता ये ज़नाब फ़लाना चावलानी हैं या फिर ढिमका लाल अग्रवाल । शायद उस रात भी कुछ ऐसा ही हुआ । लेकिन ऐसा क्या हुआ की विदेश से आये दोस्त के साथ पहुंचे देशी दोस्त आज गैर इरादतन ह्त्या के आरोपी बना दिए गए ? क्यूँ गौरांग ही मारा गया ? क्या दोस्तों के बीच किसी तरह का विवाद हुआ, कोई पुरानी रंजिश थी ? आख़िर क्यों मारा गया या हादसे में मर गया गौरांग ? कई सुलगते सवाल है जो पहले भी उठाये जा चुके हैं । मौकाए-वारदात का मुआयना करने के बाद पुलिस ने भी माना था मामला हत्या का हो सकता है फिर विवेचना में गैर इरादतन हत्या का खुलासा क्यों ? आम चर्चा में इस मौत को हत्या ही माना गया, जनशोर की माने तो हत्या बार के बाउंसरों ने की जिसमें कुछ दोस्तों का हाथ है । मगर पुलिस कप्तान के खुलासे ने सारी संभावनाओं और आशंकाओं को ही ख़त्म कर दिया । पुलिस की लंबी विवेचना और संदेहियों से पूछताछ के बीच उन कयासों पर भी निराशा ही हाथ लगी जिसमें डाक्टरों ने जिक्र किया था लाश पर चोट के निशान और फटा हुआ लिवर सामान्य रूप से सीढ़ी से गिराने-गिरने से संभव नहीं ।
 अब गौरांग के परिवार को न्याय चाहिए । गौरांग की बहन ने पुलिस की विवेचना और उसके तरीके पर पहले ही शक जाहिर कर दिया था वो अपने भाई को न्याय दिलाने के लिए आखरी सांस तक लड़ने का ऐलान कर चुकी है । न्याय के मंदिर पर पूरा भरोसा है, अब उसे साथ के लिए सिर्फ उन लोगों की जरूरत है जो ज़िंदा होने की बात कहते हैं । ये लड़ाई एक बेटे,भाई को न्याय दिलाने के लिए शुरू की गई है जिसमें काफी लोग एकजुट हैं । इधर इस मामले में पुलिस की कार्रवाही पर हर जुबां पर सैकड़ों सवाल हैं मगर जवाब देने कोई तैयार नहीं । गौरांग की मौत और उससे जुड़े सभी सवालों को लेकर काफी दबाव पुलिस पर भी रहा । हत्या या हादसा ? पुलिस किसे पकड़ती, किसे छोड़ती। सारे नवाब रुपयों की गर्मी के बीच पलकर बड़े हुए । मालूम था करतूत के अंजाम का खर्च । उन्हें शायद पता थी सबकी कीमत तभी तो पुलिस की एफआईआर के मुताबिक़ गैर इरादतन हत्या के आरोपी जेल भेजे जाने तक पुलिस की ख़ास व्यवस्था के बीच रहे । घर का लज़ीज़ खाना, नाश्ता-चाय सब कुछ स्वादानुसार दिया जाता रहा । अब आरोपियों के परिजन जेल की चाहर दिवारी के इर्द-गिर्द मज़मा लगाये खड़े हैं । दरअसल रसूखदारों को इस सिस्टम की सभी खामियों और कमियों की ख़बर होती है । हर दरवाजे के पीछे बैठे सरकारी साहब की कीमत देने वाले जानते हैं मुसीबत की फांस कहाँ से निकालनी हैं। यक़ीनन इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ, बाज़ार में हल्ला है गौरांग की मौत से कई लोगों के दिन बहुर गए । करोड़ों का वारा-न्यारा हुआ । मरने वाला घर का इकलौता चिराग था, जो भीतर गए उनमें से भी कुछ घर की इकलौती शान हैं । व्यापारियों की जिन संतानों को पुलिस ने गैर इरादतन ह्त्या के मामले में जेल भेजा है उनके भविष्य की डायरी भी पुलिस को ही कोर्ट में पेश करनी है । मौत के इस मामले में जांच शुरुआत से ही कमजोर दिखाई पड़ती हैं । कड़ी दर कड़ी देखें तो पुलिस ने आरोपियों को बचने, साक्ष्य मिटाने का पूरा मौक़ा दिया । मामले की नज़ाकत को भाँपने के बाद सक्रिय हुई पुलिस स्थानीय नेताओं, मंत्रियों के दबाव में आई और वहीं से शुरू हुआ लीपापोती का खेल । कुछ लोग तो ये भी बता रहें हैं गौरांग की मौत के मामले में स्थानीय विधायक और मंत्री के फोन कॉल्स भी पुलिस के अधिकारियों को गए । साफ़-साफ़ कहा गया कोई निर्दोष नहीं फँसना चाहिए । साफ़ साफ़ मतलब था किसे बचाना है और किसे ....। इस बात को दूसरे नजरिये से देखें तो ये भी कहा जा सकता है पुलिस अधिकांशतः मामलों में निर्दोष लोगों को फंसाकर मामले का निपटारा कर देती है । यही वजह होती है 80 फीसदी से अधिक मामलों में आरोपी बाईज्जत छूट जाते हैं ।  गौरांग की मौत कई रहस्यों को साथ लेकर चली गई । मौत के मामले में पुलिस कप्तान का पिछले दिनों खुलासा भी किसी ड्रामें से कम नहीं था । सनसनीखेज मामलें में पुलिस ने करीब 40 घंटे के भीतर खुलासा कर दिया कि गौरांग की मौत गैर इरादतन हत्या है जिसमें उसके 4 दोस्त शामिल हैं । इस खुलासे में पत्रकारों से ज्यादा आमजनमानस और तमाशाई नज़र आये । कई सवाल पूछे जाने थे लेकिन प्रेस कांफ्रेंस की आड़ में किया गया ड्रामा सिर्फ पुलिस कप्तान को बोलने का मौक़ा देता रहा । कुछ ने मुँह खोलकर जिज्ञासा मिटानी चाही लेकिन साहब के तेवर देख सवाल गले से बाहर नहीं आये । 
   एक गौरांग चला गया, कई गौरांग अब भी बाकी हैं जिन्हें समय रहते घर से सही नसीहत नहीं मिली तो घर का चिराग़ हमेशा के लिए अनंत आकाश में कहीं विलुप्त हो जायेगा । समय रहते कोशिश करनी होगी अब किसी के घर का गौरांग ना तो ऐसे दोस्त बनाये ना ही ऐसे अड्डों पर वक्त जाया करे जहां से घर लौटना संभव ना हो । वैसे ये नसीहत रसूखदारों के लिए नहीं है । अब इंतज़ार रहेगा सिर्फ न्याय मिलने की तारीख का .... तब तक, शोर-शराबा और मलाल ।

तिरछी नज़र से !

 
 सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया के इस दौर में छिपने-छिपाने को कुछ ख़ास नहीं रह जाता । ये ऐसे मंच हैं जहां आप-हम अपने विचार उन्मुक्त भाव से साझा करते हैं और शब्दों की स्वरचित सीमा में अपनी बात को कह देने का साहस जुटा लेते हैं । जिन बातों, मुद्दों को इलेक्टॉनिक और प्रिंट मीडिया में अपेक्षित जगह नहीं मिल पाती वो सोशल मीडिया के माध्यम से दुनिया के हर कोने तक पहुंच रहें हैं । अब बिलासपुर (छत्तीसगढ़) के तत्कालीन आई.जी. पवन देव के मुद्दे को ही ले लीजिये । महिला सिपाही से मोबाईल पर अश्लील बातें करने, उसे बंगले बुलाकर उसके खूबसूरत जिस्म से प्यार करने की कोशिश ने ख़ासा बवाल मचाया । अख़बार, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने कई दिन तक पवन को सुर्ख़ियों में रखा लेकिन सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया पर साहब की करतूतों के चर्चे अभी भी सुर्ख़ियों में हैं । अब एक महिला का नाम सामने आया हैं जिस पर आरोप है कि उसने अपने पति को आत्महत्या के लिए मजबूर किया । पुलिस में मामला दर्ज होने के बाद आई.जी.पवन देव के व्यक्तिगत रूचि लेने पर मामले को खात्में में डाल दिया गया । अब उस महिला को बार-बार ये कहना पड़ रहा है की उसका पवन देव से कोई संबंध नहीं है । कई बार इस तरह के मामले सुर्खियां बटोरने के लिए भी किये जाते हैं लेकिन इस बार पवन के खिलाफ हवा का रुख कुछ ज्यादा ही तेज है ।
            सांस अभी बाकी है ...
             
 छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की नब्ज़ टटोलने पर ही पता चलता है उसकी सांस अभी चल रही है । सत्ता से विमुख हुए डेढ़ दशक पूरे होने को हैं, विपक्ष में रहकर भी कोई ख़ास भूमिका निभाई हो दिखाई नहीं पड़ता । पार्टी कार्यक्रम और सियासी विरोध प्रदर्शन को छोड़ दें तो कांग्रेस एक भी ऐसा मुद्दा नहीं गिना सकती जिसके दम पर सरकार की पेशानी पर बल पड़ा हो । बिलासपुर में कांग्रेस की गुटबाजी का छोर खोजने निकलें तो पता ही नहीं चलता कौन सा सिरा कहाँ किससे मिला है । बिलासपुर विधायक अमर अग्रवाल की चौथी पारी, बतौर मंत्री उनकी हैट्रिक फिर भी कांग्रेस कहती है बेईमानों का राज बदल दो... अमर अग्रवाल मस्त...जनता त्रस्त । इन नारों से नगर सेठ की सेहत पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता, हाँ इस तरह के शोर से कांग्रेसी प्रदर्शक भी बुरे नहीं बनते । इतना विरोध, शोर शराबा सियासत के पैंतरों में शामिल है । बिलासपुर में सीवरेज और सड़क की दुर्दशा पर स्यापा मचाने वाले क्यूँ भूल रहे इसी दुर्दशा की तस्वीर के बीच सेठ ने चुनावी दंगल में बिलासपुर विधानसभा से अमर रहने का आशीर्वाद लगातार चौथी बार बटोर लिया । दूसरी बात सीवरेज के काम को किनारे कर दें तो शहर की सड़कें, गालियां, नाली और चौक-चौराहों के साथ सौंदर्यीकरण का अधिकाँश काम कांग्रेसी ठेकेदारों ने ही किया । कायम रहने के लिए नगर सेठ की देहरी पर माथा भी टेका । कई बे-गैरतमंद सियासी बाज़ार में मुँहबोली कीमत में बिके भी, फिर किस बात का स्यापा..? सड़क पर रोपा लगाकर उसकी दुर्दशा दिखाने की कोशिश में एक जुट हुए कांग्रेसी भीतर से कितने कद्दावर है ? सभी का ज़मीर जानता है, इस तरह के विरोध प्रदर्शन सिर्फ ख़बरों में बने रहने के लिए होते हैं । शहर की आबरू से सबने खेलने की कोशिश सभी ने की । सियासी खेल में शह-मात का खेल, लेकिन पिछले तीन पंचवर्षीय से एक तरफा खेल । बाजी खेलने-खिलाने वालों को भी वजहें पता है ऐसे में सड़क की दुर्दशा को लेकर प्रदशर्न ? अरे भाई गौरव पथ ने शहर का मान बढ़ाया, अरपा की रेत से तेल निकालकर उसकी दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू, बहुत कुछ है । कहने को, सुनाने को मगर सिर्फ कहने सुनाने से नहीं बल्कि कुछ करके दिखाना होगा । शहर की दुर्दशा के लिए शायद हम सब जिम्मेवार हैं । 
                छत्तीसगढ़ जनता पार्टी (जोगी)

छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल ला देने की अफवाहों के बीच पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने कांग्रेस का दामन छोड़कर नई पार्टी बनाई । वन मैन शो के आदि रहे जोगी को कांग्रेस में लगातार उपेक्षा के दंश झेलने पड़ रहे थे । काफी शोर-शराबे और ड्रामें के बाद पार्टी बनाई गई जिसका नाम छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस (जोगी) रखा गया । पार्टी की नई कार्यकारिणी बनाई गई और अक्सर मौक़ा देख यहां वहां पहुंचकर राजनीति करने वालों को जिम्मेदारियों के बोझ तले दबाया गया । कुछ जोगी भक्त, कुछ स्वामी पसंद तो कुछ दबाव या महत्वकांक्षा बस पुराने कमिया (पूर्व मुख्यमंत्री) के साथ हो लिए । अब विडम्बना ये कि जिन लोगों को 13 साल से ज्यादा हो गए सत्ता के गलियारे से दूर हुए वो कांग्रेस तो दूर नई पार्टी का नाम भी ठीक से नहीं ले पा रहे । अजीत जोगी ने नई पार्टी की युवा टीम का गठन किया । छत्तीसगढ़ जनता युवा कांग्रेस की कार्यकारिणी में अंकित गौराह को बिलासपुर संभाग की जिम्मेवारी सौंपीं गई । नई जिम्मेवारी के लिए उन्हें मेरी भी शुभकामनाएं मगर नए संभाग प्रभारी अब भी पार्टी के नाम को लेकर असमंजस में हैं । शायद मन भाजपाई हो गया, दिल जोगी को छोड़ना नहीं चाहता और कांग्रेस के नमक का स्वाद अब भी जबान पर बाकी है । उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी नई जिम्मेवारियों की सूचना अख़बार की कतरन के साथ पोस्ट की । अंकित की माने तो उन्हें छत्तीसगढ़ जनता पार्टी (जोगी) में बिलासपुर संभाग का प्रभारी बनाया गया है । अखबार की कतरन कुछ और कहती है ? वैसे भी जोगी परिवार की सत्तासीन भाजपा से मधुरता छिपी नहीं है शायद अंकित ने अनजाने ही सही उसे यहां शब्दों में अंकित कर दिया ।
           इस पोस्ट पर लगी सभी कतरन सोशल और डिजिटल मीडिया से ली गई है ।

राम के भक्त रहीम के बन्दे !

                       
  "उनकी माँ को मरे हुए अभी तेरह दिन भी पूरे नहीं हुए थे, बेटे संपत्ति बटवारे को लेकर निर्वस्त्र सड़क पर बैठ गए । कोई कह रहा था कलह सालों पुराना है, माँ के मरते ही बाज़ारू हो गया । जर-जोरू और ज़मीन के विवाद सालों पुराने हैं । इनके परिणाम कभी सुखद नहीं रहे फिर भी लोग लड़ते रहे, लाशें गिरती रहीं। संपत्ति को लेकर आदम की नग्नता सदियों पुरानी है। महाभारत हुई, इतिहास गवाह है किसे क्या मिला ? कल जब उसके बेटे निर्वस्त्र होकर संस्कारधानी में अपने ही खून से हिस्सा-बँटवारा मांग रहे थे उस दौरान तमाशाइयों का लगा मज़मा अफवाहों के बाजार में गर्माहट पैदा करता रहा। किसी ने धर्म से जोड़कर कुछ बाते कह दीं तो कोई कुछ और कहता रहा । जितने मुंह उतनी बातें, मानसिक नग्नता के शिकार तीन लोग निर्वस्त्र होकर सड़क पर क्यों मौन धरे बैठ गए तमाशाइयों को आज के अखबारों ने बताया ।" 
         अमूमन रविवार को मेरे शहर की दुकाने बंद रहती हैं लेकिन फुटपाथ पर लगा बाज़ार लोगों की भीड़ से गुलज़ार रहता है । लाखों का व्यापार फुटपाथ से होता है । कल भी सब कुछ पिछले रविवारों की तरह ही चल रहा था, अचानक सदर बाज़ार में लोगों की आवाजाही थम सी गई । देखते ही देखते भीड़ की शक्ल बड़ी दिखाई दी । जिस किसी को देखो भीड़ में हिस्सेदार बनता रहा । दरअसल भीड़ के बीच का नज़ारा ही कुछ ऐसा था । एक व्यक्ति स्कार्पियो की छत पर नग्न अवस्था में आसन लगाये बैठा था, दूसरा सामने की दुकान के चबूतरे पर और तीसरा नंगा वाहन के भीतर । भीड़-भाड़ वाले इलाके में तीन इंसान निर्वस्त्र, मौन साधे। तमाशाइयों के मन में कौतूहल, आखिर ये निर्वस्त्र त्रिदेव कौन हैं ? कुछ ने उन्हें तपस्वी मान लिया, तो कोई बाज़ार में इस लीला को कुछ और नाम देता रहा ।
                  इस तमाशे की हकीक़त सिर्फ पुश्तैनी संपत्ति और मौत के बाद बूढी माँ के जेवरात का बँटवारा थी । शहर में रहने वाले एक जैन परिवार के तीन सदस्यों की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक नग्नता कल बीच बाज़ार थी । अंग प्रदर्शन की तस्वीरें मोबाईल के जरिये सोशल मिडिया फिर अख़बार में सुर्खियां बनी । इस जैन परिवार का सदर बाज़ार में मकान और एक कपड़ा दुकान है । 29 जून को इस परिवार को सहेजकर रखने वाली महिला संसार से हमेशा हमेशा के लिए रुख़सत हो गई । माँ को संसार छोड़े अभी 10 ही दिन हुए थे कि बेटे आपस में लड़ बैठे । बेटों को माँ के गहनों और पुरखौती संपत्ति में बराबर का हिस्सा चाहिए । घर के भीतर का विवाद जब बाहर सड़क पर नग्नता की शक्ल में आया तो हर आने-जाने वालो को खबर हो गई कपड़ा बेचने वाले जैन व्यापारी कितने खोखले हैं । शहर के आवाम की नज़रों में कपड़ा बेचने वाला परिवार आज सिर्फ शारीरिक रूप से नंगा नहीं था बल्कि उसने अपनी संवेदनहीनता के साथ पशुवत आचरण की नई मिशाल पेश कर दी थी । माँ की तेरही कार्यक्रम के ठीक एक दिन पहले का ये मंजर आज के इंसान की असल सूरत दिखा रहा था जिस पर कभी मच्छर तो कभी मख्खियाँ भिन-भिना रहीं थी । घर के भीतर का क्लेश जब सड़क पर कपड़ा उतारकर खड़ा हुआ तो पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा । मौके पर पहुंची पुलिस ने पहले उन तमाशाइयों को खदेड़ा जो सारा काम काज छोड़कर सदर बाज़ार की मुख्य सड़क पर यातायात अवरुद्ध कर रहे थे । उसके बाद जेवरात और संपप्ति के लालचियों को थाने लाकर समझाईश दी गई, चूँकि पुलिस हस्तक्षेप लायक मामला नहीं था लिहाज चेतावनी देकर लोगों को छोड़ दिया गया । इधर पूरे मामले में तमाशाइयों के फुर्सत भरे लम्हों को सोचकर हंसी आती है । लोग अक्सर दूसरों के विवाद या घटनाक्रम में भीड़ का हिस्सा तो बन जाते हैं मगर उन्हें घटनाक्रम की वस्तु स्थिति की जानकारी नहीं होती । इस तरह की भीड़ अक्सर सामान्य माहौल बिगाड़ने में अहम् भूमिका निभाती है । साथ ही इस तरह के नंगों को बल देती है । 
                                      समाज के भीतर का खोखलापन और हम इंसानों की बदलती मनोवृत्ति का सबूत देती ये घटना उस हकीकत से भी वाकिफ़ करवाती हैं जहां एक ही कोख से जन्मी संताने ताउम्र एक दूसरे की दुश्मन बनी हुई हैं । विवादों की वजहें अलग-अलग हो सकती हैं । एक बात और इस दौर में अपनापन, संवेदना जैसे शब्दों को लिए हम जब भी चेहरे तलाशने निकलेंगे हाथ खाली ही मिलेगा । एक घर, एक छत के नीचे रहकर लोग सिर्फ अपने लिए जी रहें हैं । कवि प्रदीप जी दशकों पहले लिख गए ... 
                                                 राम के भक्त रहीम के बन्दे ,रचते आज फरेब के फंदे 
                                                 कितने ये मक्कार ये अंधे ,देख लिए इनके भी फंदे 
                                                 इन्ही की काली करतूतों से, बना ये मुल्क मसान 
                                                कितना बदल गया इंसान....  आज भाई-भाई का नहीं, बेटा माँ-बाप की मौत की बाट जोहता मन के भीतर लालसा के पौधे की जड़ों को मजबूत कर रहा  । बीवी पति को लेकर अलग रहने को व्याकुल । क्यों आखिर ?  
                       क्यूँ ये नर आपस में झगड़ते , काहे लाखों घर ये उजड़ते 
                       क्यूँ ये बच्चे माँ से बिछड़ते....  सच ही तो है आखिर कहाँ पहुँच गए हम लोग, किस दौर में हैं जहां कोई अपना नहीं ?

देव को 'आशीष'

                                       
                                
                                             "मेरे पास उत्तेजित होने के लिए कुछ भी नहीं है
                                                  न कोकशास्त्र की किताबें, न युद्ध की बात
                                                  न गद्देदार बिस्तर, न टाँगें, न रात,चाँदनी
                                         कुछ भी नहीं... " ये सुदामा प्रसाद पांडेय [धूमिल] कहते है जिनके पास उत्तेजना के लिए कुछ भी नहीं पर जिनके पास उत्तेजित होने के लिए सब कुछ है वो क्यों सुर्ख़ियों में हैं ? अरे उनकी कामुकता के चर्चे बाज़ार में यूँ आम हुए जैसे कोई सेठ घरवाली के बाहर जाते ही नौकरानी संग रास रचाता पकड़ लिया जाता है। पकडे जाने के बाद 'देव' दुहाई देता है ... भगवान जानता है सच क्या है ? अरे साहब हर गुनहगार की एक ही दलील होती है " मुझे साजिश के तहत फँसाया गया हैं, मैं बिल्कुल निर्दोष हूँ।"  
       जून बीत गया था, बस आखरी तारीख निकल जाती तो शायद बदनामी का चन्दन माथे पर नहीं लगता। संस्कारधानी [बिलासपुर] में क़ानून के जानकार और पुलिस महकमें के बड़के साहब यानि रेंज के महानिरीक्षक पवन देव अक्सर छेड़खानी करते रहें हैं। आज के अख़बार कहते हैं जहां रहे छेड़छाड़ की। शिकायतें  और उनकी महिलाओं से बे-तक्लुफि के कई किस्से राज्य के पुलिस मुख्यालय में हैं। हर बार देव ने भगवन के हवाले से कह दिया साजिश का शिकार हो गया। इस बार के वाक्ये को सुनने और सिलसिलेवार घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ने पर मुझे भी लगता है 'देव' को किसी ने छेड़छाड़ में फंस जाने का 'आशीष ' दे दिया। ३० जून के अखबारों ने बताया बिलासपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक पवन देव पिछले दो साल से एक महिला आरक्षक को छेड़ रहें हैं। अक्सर साहब अपने रुतबे को सामने रख अश्लीलता के किस्से मोबाईल के जरिये महिला आरक्षक को सुनाया करते थे। बंगले बुलाना, खूबसूरत फिगर की तारीफ़ कर प्यार करने की बातें अक्सर हुआ करती थीं, फिर उस रात ऐसा क्या हुआ जो साहब की नशीली आवाज सोशल मीडिया के जरिये लोगों तक पहुँच गई ? इतना ही नहीं आधी रात को बंगले बुलाने की गुस्ताखी थाने के रास्ते राज्य महिला आयोग तक पहुँची । आरोप लगा रही महिला आरक्षक ने सरकार की चौखट पर दस्तक दी तो जांच की बात कहकर तबादले की गाज गिराकर देव को पुलिस मुख्यालय बुला लिया गया। अब देव राजधानी में हैं, इस तरह के मामलों में पहले भी मुख्यालय में लूप लाइन वाली कुर्सी पा चुके हैं। साहब पर जिस दिन आरोप लगाया गया उसके एक दिन पहले ही उन्होंने पदानवत किये गए उपनिरीक्षक आशीष वासनिक को सेवा से बर्खास्त किये जाने का आदेश जारी किया था। सवाल और संदेह आशीष की ओर इशारा करते हैं, आरोपों से घिरे साहब भी उसी की करतूत मानते हैं। महिला आरक्षक भी मीडिया को दिए बयान में बर्खास्त पुलिस कर्मी वासनिक से घनिष्ट सम्बन्ध होना स्वीकार कर चुकी है। सवाल आखिर तीन साल से साहब की छेड़छाड़ और अश्लीलता को बर्दाश्त करने वाली महिला अचानक रुष्ठ क्यों हो गई ? जांच का विषय है, निष्पक्ष हुई तो कई करतूतों के साथ चेहरों से मुखौटे हट जाएंगे। 
      ये महज एक नाम है जिसका चेहरा आपसी खींचतान के चलते बेनकाब हो गया । पवन देव का कार्यकाल सुर्ख़ियों में रहा है, आशीष की कार्यशैली से विभाग और मित्र वाकिफ़ ही हैं । किसी ने सच ही कहा है पुलिस वालों की दोस्ती अच्छी ना दुश्मनी । राज्य में कई प्रशासनिक अफसरों के चेहरे महिलाओं की अस्मत से जुड़े मामलों को लेकर सामने आते रहें हैं । कईयों ऐसे प्रसासनिक अफ़सर हैं जिनको इज़्ज़त की नज़रों से नही देखा जाता क्योंकि 'जिस्म' उनकी जरूरत बन चुकी है । प्रशासनिक ओहदे की आड़ में ऐसे अफसरों  की भूख मिटती रहती है और इन तक पहुँचने या पहुंचाने वाली महिलाओं की तरक्की के रास्ते एकाएक खुल जाते हैं । राज्य में बड़े पदों पर आसीन कई चेहरें दिन के उजाले में जितने सलीकेदार दिखाई पड़ते हैं दिन ढलते ही या मौक़ा मिलते ही उनकी नंगी मानसिकता खुलकर सामने आ जाती है । सवाल दिमागी नग्नता का नही बल्कि उस दोहरे चरित्र का है जो समाज की भीड़ में कुछ और कहता है और अकेले में उसी इज़्ज़त का वस्त्र उतारकर अपनी हवस मिटाने पर आमादा दिखाई पड़ता है । कुछ अफसरों की सादगी, समाज को लेकर उनका नजरिया, महिलाओं के प्रति उनकी सोच और सार्वजनिक मंच से ज्ञान बघारने का शोर अक्सर हमको भ्रमित कर देता है । हकीकत जब सामने आती है तो मालूम होता है फलां साहब भी.... शौक़ीन हैं। देव साहब का शौक अब सार्वजनिक है । कुछ और नाम है जो पहले ही नाम कमा चुके हैं ।  देखते हैं पवन के मामले में बैठाई गई जांच कितने दिनों में सामने आती है और सच के कितने करीब होगी ? 
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